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नाथ सम्प्रदाय का परिचय

यह सम्प्रदाय भारत का परम प्राचीन, उदार, ऊँच-नीच की भावना से परे एंव अवधूत अथवा योगियों का सम्प्रदाय है।इसका आरम्भ आदिनाथ शंकर से हुआ है और इसका वर्तमान रुप देने वाले योगाचार्य बालयति श्री गोरक्षनाथ भगवान शंकर के अवतार हुए है। इनके प्रादुर्भाव और अवसान का कोई लेख अब तक प्राप्त नही हुआ। पद्म, स्कन्द शिव ब्रह्मण्ड आदि पुराण, तंत्र महापर्व आदि तांत्रिक ग्रंथ बृहदारण्याक आदि उपनिषदों में तथा और दूसरे प्राचीन ग्रंथ रत्नों में श्री गुरु गोरक्षनाथ की कथायें बडे सुचारु रुप से मिलती है।श्री गोरक्षनाथ वर्णाश्रम धर्म से परे पंचमाश्रमी अवधूत हुए है जिन्होने योग क्रियाओं द्वारा मानव शरीरस्थ महा शक्तियों का विकास करने के अर्थ संसार को उपदेश दिया और हठ योग की प्रक्रियाओं का प्रचार करके भयानक रोगों से बचने के अर्थ जन समाज को एक बहुत बड़ा साधन प्रदान किया।श्री गोरक्षनाथ ने योग सम्बन्धी अनेकों ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे जिनमे बहुत से प्रकाशित हो चुके है और कई अप्रकाशित रुप में योगियों के आश्रमों में सुरक्षित हैं। श्री गोरक्षनाथ की शिक्षा एंव चमत्कारों से प्रभावित होकर अनेकों बड़े-बड़े राजा इनसे दीक्षित हुए। उन्होंने अपने अतुल वैभव को त्याग कर निजानन्द प्राप्त किया तथा जन-कल्याण में अग्रसर हुए। इन राजर्षियों द्वारा बड़े-बड़े कार्य हुए। श्री गोरक्षनाथ ने संसारिक मर्यादा की रक्षा के अर्थ श्री मत्स्येन्द्रनाथ को अपना गुरु माना और चिरकाल तक इन दोनों में शका समाधान के रुप में संवाद चलता रहा। श्री मत्स्येन्द्र को भी पुराणों तथा उपनिषदों में शिवावतर माना गया अनेक जगह इनकी कथायें लिखी हैं।यों तो यह योगी सम्प्रदाय अनादि काल से चला आ रहा किन्तु इसकी वर्तमान परिपाटियों के नियत होने के काल भगवान शंकराचार्य से 200 वर्ष पूर्व है। ऐस शंकर दिग्विजय नामक ग्रन्थ से सिद्ध होता है।बुद्ध काल में वाम मार्ग का प्रचार बहुत प्रबलता से हुअ जिसके सिद्धान्त बहुत ऊँचे थे, किन्तु साधारण बुद्धि के लोग इन सिद्धान्तों की वास्तविकता न समझ कर भ्रष्टाचारी होने लगे थे।इस काल में उदार चेता श्री गोरक्षनाथ ने वर्तमान नाथ सम्प्रदाय क निर्माण किया और तत्कालिक 84 सिद्धों में सुधार का प्रचार किया। यह सिद्ध वज्रयान मतानुयायी थे।इस सम्बन्ध में एक दूसरा लेख भी मिलता है जो कि निम्न प्रकार हैः-ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ, ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ, मत्स्येन्द्र नाथ और गुरु गोरक्षनाथ। सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है।यह योगी सम्प्रदाय बारह पन्थ में विभक्त है, यथाः-सत्यनाथ, धर्मनाथ, दरियानाथ, आई पन्थी, रास के, वैराग्य के, कपिलानी, गंगानाथी, मन्नाथी, रावल के, पाव पन्थी और पागल।इन बारह पन्थ की प्रचलित परिपाटियों में कोई भेद नही हैं। भारत के प्रायः सभी प्रान्तों में योगी सम्प्रदाय के बड़े-बड़े वैभवशाली आश्रम है और उच्च कोटि के विद्वान इन आश्रमों के संचालक हैं।श्री गोरक्षनाथ का नाम नेपाल प्रान्त में बहुत बड़ा था और अब तक भी नेपाल का राजा इनको प्रधान गुरु के रुप में मानते है और वहाँ पर इनके बड़े-बड़े प्रतिष्ठित आश्रम हैं। यहाँ तक कि नेपाल की राजकीय मुद्रा (सिक्के) पर श्री गोरक्ष का नाम है और वहाँ के निवासी गोरक्ष ही कहलाते हैं। काबुल- गान्धर सिन्ध, विलोचिस्तान, कच्छ और अन्य देशों तथा प्रान्तों में यहा तक कि मक्का मदीने तक श्री गोरक्षनाथ ने दीक्षा दी थी और ऊँचा मान पाया था।इस सम्प्रदाय में कई भाँति के गुरु होते हैं यथाः- चोटी गुरु, चीरा गुरु, मंत्र गुरु, टोपा गुरु आदि।श्री गोरक्षनाथ ने कर्ण छेदन-कान फाडना या चीरा चढ़ाने की प्रथा प्रचलित की थी। कान फाडने को तत्पर होना कष्ट सहन की शक्ति, दृढ़ता और वैराग्य का बल प्रकट करता है।श्री गुरु गोरक्षनाथ ने यह प्रथा प्रचलित करके अपने अनुयायियों शिष्यों के लिये एक कठोर परीक्षा नियत कर दी। कान फडाने के पश्चात मनुष्य बहुत से सांसारिक झंझटों से स्वभावतः या लज्जा से बचता हैं। चिरकाल तक परीक्षा करके ही कान फाड़े जाते थे और अब भी ऐसा ही होता है। बिना कान फटे साधु को 'ओघड़' कहते है और इसका आधा मान होता है। भारत में श्री गोरखनाथ के नाम पर कई विख्यात स्थान हैं और इसी नाम पर कई महोत्सव मनाये जाते हैं।यह सम्प्रदाय अवधूत सम्प्रदाय है। अवधूत शब्द का अर्थ होता है " स्त्री रहित या माया प्रपंच से रहित" जैसा कि " सिद्ध सिद्धान्त पद्धति" में लिखा हैः-"सर्वान् प्रकृति विकारन वधु नोतीत्यऽवधूतः।"अर्थात् जो समस्त प्रकृति विकारों को त्याग देता या झाड़ देता है वह अवधूत है। पुनश्चः-" वचने वचने वेदास्तीर्थानि च पदे पदे।इष्टे इष्टे च कैवल्यं सोऽवधूतः श्रिये स्तुनः।""एक हस्ते धृतस्त्यागो भोगश्चैक करे स्वयम्अलिप्तस्त्याग भोगाभ्यां सोऽवधूतः श्रियस्तुनः॥"उपर्युक्त लेखानुसार इस सम्प्रदाय में नव नाथ पूर्ण अवधूत हुए थे और अब भी अनेक अवधूत विद्यमान है।नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से अपने इष्ट देव का ध्यान करते है। परस्पर आदेश या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है जिसका वर्णन वेद और उपनिषद आदि में किया गया है।योगी लोग अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते है जिसे 'सिले' कहते है। गले में एक सींग की नादी रखते है। इन दोनों को सींगी सेली कहते है यह लोग शैव हैं अर्थात शिव की उपासना करते है। षट् दर्शनों में योग का स्थान अत्युच्च है और योगी लोग योग मार्ग पर चलते हैं अर्थात योग क्रिया करते है जो कि आत्म दर्शन का प्रधान साधन है। जीव ब्रह्म की एकता का नाम योग है। चित्त वृत्ति के पूर्ण निरोध का योग कहते है। वर्तमान काल में इस सम्प्रदाय के आश्रम अव्यवस्थित होने लगे हैं। इसी हेतु "अवधूत योगी महासभा" का संगठन हुआ है और यत्र तत्र सुधार और विद्या प्रचार करने में इसके संचालक लगे हुए है।प्राचीन काल में स्याल कोट नामक राज्य में शंखभाटी नाम के एक राजा थे। उनके पूर्णमल और रिसालु नाम के पुत्र हुए। यह श्री गोरक्षनाथ के शिष्य बनने के पश्चात क्रमशः चोरंगी नाथ और मन्नाथ के नाम से प्रसिद्ध होकर उग्र भ्रमण शील रहें।

श्री नवनाथ

1.श्री गुरु आदिनाथ जी(ज्योति स्वरुप) 2.श्री गुरु उदयनाथ जी(पार्वती स्वरुप) 3.श्री गुरु सत्यनाथ जी(ब्रह्मा स्वरुप) 4.श्री गुरु सन्तोषनाथ जी(विष्णु स्वरुप) 5.श्री गुरु अचल अचम्भेनाथ(शेषनाग स्वरुप) 6.श्री गुरु गज कन्थड़नाथ(गणेश स्वरुप) 7.श्री गुरु चौरंगीनाथ जी(चन्द्रमा स्वरुप) 8.श्री गुरु मत्स्येँद्रनाथ जी(माया स्वरुप) 9.श्री गुरु गोरखनाथ जी(शिव स्वरुप)

नाथ सम्प्रदाय के बारह पंथ

नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी मुख्यतः बारह शाखाओं में विभक्त हैं, जिसे बारह पंथ कहते हैं । इन बारह पंथों के कारण नाथ सम्प्रदाय को ‘बारह-पंथी’ योगी भी कहा जाता है । प्रत्येक पंथ का एक-एक विशेष स्थान है, जिसे नाथ लोग अपना पुण्य क्षेत्र मानते हैं । प्रत्येक पंथ एक पौराणिक देवता अथवा सिद्ध योगी को अपना आदि प्रवर्तक मानता है । नाथ सम्प्रदाय के बारह पंथों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है - 1. सत्यनाथ पंथ - इनकी संख्या 31 बतलायी गयी है । 2. धर्मनाथ पंथ – इनकी संख्या २५ है । 3. राम पंथ - इनकी संख्या ६१ है । 4. नाटेश्वरी पंथ अथवा लक्ष्मणनाथ पंथ – इनकी संख्या ४३ है । 5. कंथड़ पंथ - इनकी संख्या १० है । 6. कपिलानी पंथ - इनकी संख्या २६ है । 7. वैराग्य पंथ - इनकी संख्या १२४ है । 8. माननाथ पंथ - इनकी संख्या १० है । 9. आई पंथ - इनकी संख्या १० है । 10. पागल पंथ – इनकी संख्या ४ है । 11.ध्वजनाथ पंथ - इनकी संख्या ३ है । 12. गंगानाथ पंथ - इनकी संख्या ६ है । कालान्तर में नाथ सम्प्रदाय के इन बारह पंथों में छह पंथ और जुड़े - १॰ रावल (संख्या-७१), २॰ पंक (पंख), ३॰ वन, ४॰ कंठर पंथी, ५॰ गोपाल पंथ तथा ६॰ हेठ नाथी । इस प्रकार कुल बारह-अठारह पंथ कहलाते हैं । बाद में अनेक पंथ जुड़ते गये, ये सभी बारह-अठारह पंथों की उपशाखायें अथवा उप-पंथ है । कुछ के नाम इस प्रकार हैं - अर्द्धनारी, अमरनाथ, अमापंथी। उदयनाथी, कायिकनाथी, काममज, काषाय, गैनीनाथ, चर्पटनाथी, तारकनाथी, निरंजन नाथी, नायरी, पायलनाथी, पाव पंथ, फिल नाथी, भृंगनाथ आदि

84 नाथ सम्प्रदाय सिद्ध

सनक नाथ जी लंक्नाथ रैवेन नाथ जी सनातन नाथ जी विचार नाथ जी / भ्रिथारी नाथ जी चक्रनाथ जी नरमी नाथ जी रतन नाथ जी श्रृंगेरी नाथ जी सनंदन नाथ जी निवृति नाथ जी सनत कुमार नाथ जी ज्वालेंद्र नाथ जी i सरस्वती नाथ जी ब्राह्मी नाथ जी प्रभुदेव नाथ जी कनकी नाथ जी धुन्धकर नाथ जी नारद देव नाथ जी मंजू नाथ जी मानसी नाथ जी वीर नाथ जी हरिति नाथ जी नागार्जुन नाथ जी भुस्कई नाथ जी मदर नाथ जी गहिनी नाथ जी भूचर नाथ जी हम्ब्ब नाथ जी वक्र नाथ जी चर्पट नाथ जी बिलेश्याँ नाथ जी कनिपा नाथ जी बिर्बुंक नाथ जी ज्ञानेश्वर नाथ जी Tara नाथ जी सुरानन्द नाथ जी सिद्ध बुध नाथ जी भागे नाथ जी पीपल नाथ जी चन्द्र नाथ जी भद्र नाथ जी एक नाथ जी मानिक नाथ जी घेहेल्लेअरो नाथ जी काय नाथ जी नाथ जी बाबा Mast नाथ जी याग्यवलक्य नाथ जी गौर नाथ जी तिन्तिनी नाथ जी दया नाथ जी हवाई नाथ जी दरिया नाथ जी खेचर नाथ जी घोडा नाथ जी संजी नाथ जी सुखदेव नाथ जी आघॉद नाथ जी देव नाथ जी प्रकाश नाथ जी कोर्ट नाथ जी बालक नाथ जी बाल्गुँदै नाथ जी शबर नाथ जी विरूपाक्ष नाथ जी मल्लिका नाथ जी गोपाल नाथ जी लाघी नाथ जी अलालम नाथ जी सिद्ध पढ़ नाथ जी आडबंग नाथ जी गौरव नाथ जी धीर नाथ जी सहिरोबा नाथ जी प्रोद्ध नाथ जी गरीब नाथ जी काल नाथ जी धरम नाथ जी मेरु नाथ जी सिद्धासन नाथ जी सूरत नाथ जी मर्कंदय नाथ जी मीन नाथ जी काक्चंदी नाथ जी भागे नाथ जी पीपल नाथ जी Chandra Nath Ji भद्र नाथ जी एक नाथ जी मानिक नाथ जी घेहेल्लेअरो नाथ जी काय नाथ जी बाबा मस्त नाथ जी Yagyawalakya नाथ जी गौर नाथ जी तिन्तिनी नाथ जी दया नाथ जी हवाई नाथ जी दरिया नाथ जी खेचर नाथ जी घोडा नाथ जी संजी नाथ जी सुखदेव नाथ जी आघॉद नाथ जी देव नाथ जी प्रकाश नाथ जी कोर्ट नाथ जी बालक नाथ जी बाल्गुँदै नाथ जी शबर नाथ जी मल्लिका नाथ जी गोपाल नाथ जी लाघी नाथ जी अलालम नाथ जी सिद्ध नाथ जी आडबंग नाथ जी गौरव नाथ जी धीर नाथ जी सहिरोबा नाथ जी प्रोद्ध नाथ जी Garib नाथ जी काल नाथ जी धरम नाथ जी मेरु नाथ जी सिद्धासन नाथ जी सूरत नाथ जी मर्कंदय नाथ जी मीन नाथ जी काक्चंदी नाथ जी

नवनाथ-शाबर-मन्त्र

“ॐ नमो आदेश गुरु की। ॐकारे आदि-नाथ, उदय-नाथ पार्वती। सत्य-नाथ ब्रह्मा। सन्तोष-नाथ विष्णुः, अचल अचम्भे-नाथ। गज-बेली गज-कन्थडि-नाथ, ज्ञान-पारखी चौरङ्गी-नाथ। माया-रुपी मच्छेन्द्र-नाथ, जति-गुरु है गोरखनाथ। घट-घट पिण्डे व्यापी, नाथ सदा रहें सहाई। नवनाथ चौरासी सिद्धों की दुहाई। ॐ नमो आदेश गुरु की।।

श्री नवनाथ-स्तुति

“आदि-नाथ कैलाश-निवासी, उदय-नाथ काटै जम-फाँसी। सत्य-नाथ सारनी सन्त भाखै, सन्तोष-नाथ सदा सन्तन की राखै। कन्थडी-नाथ सदा सुख-दाई, अञ्चति अचम्भे- नाथ सहाई। ज्ञान-पारखी सिद्ध चौरङ्गी, मत्स्येन्द्र-नाथ दादा बहुरङ्गी। गोरख-नाथ सकल घट-व्यापी, काटै कलि- मल, तारै भव-पीरा। नव-नाथों के नाम सुमिरिए, तनिक भस्मी ले मस्तक धरिए। रोग-शोक-दारिद नशावै, निर्मल देह परम सुख पावै। भूत-प्रेत-भय-भञ्जना, नव-नाथों का नाम। सेवक सुमरे धर्म नाथ, पूर्ण होंय सब काम।।” प्रतिदिन नव-नाथों का पूजन कर उक्त स्तुति का २१ बार पाठ कर मस्तक पर भस्म लगाए। इससे नवनाथों की कृपा मिलती है। साथ ही सब प्रकार के भय-पीड़ा, रोग- दोष, भूत-प्रेत-बाधा दूर होकर मनोकामना, सुख-सम्पत्ति आदि अभीष्ट कार्य सिद्ध होते हैं। २१ दिनों तक, २१ बार पाठ करने से सिद्धि होती है।